Friday, 4 March 2016

शर्मसार होती सियासत

                                                   कैसे मंजर सामने आने लगे है
                                                  गाते गाते लोग चिल्लाने लगे है।

पिछले कुछ दिनों की घटनाओ पर अगर ध्यान दिया जाए तो हम जिस  दिशा में बढ़ रहे है उसका  अंदाज़ा किसी को भी नहीं है । हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की आत्महत्या निश्चित ही दुखदायक है लेकिन जिस प्रकार उस मुद्दे पे सियासत हो रही है क्या वो कम दुखदायक है? एक दलित समुदाय का लड़का अगर यूनिवर्सिटी प्रशाशन से दुखी हो कर  इतना बड़ा कदम उठा लेता है तो क्या ये समाज की जिम्मेदारी नहीं बनती की आगे ऐसा न हो क्या वो ये नहीं सोच सकते कि चलो इस बार जो गलतिया हुई उससे हम सबक लेंगे और  अगली बार से किसी भी समाज का विद्यार्थी  चाहे  वो दलित हो आदिवासी हो अल्पसंख्यक हो या किसी  भी धर्म,जाति अथवा वर्ग का क्यों न हो ऐसा कुछ उसके साथ न होने पाये ।लेकिन इसके उलट ये हमारे देश की राजनेतिक व्यस्था का श्राप ही है  जिससे इस मुद्दे पर  हर कोई राजनैतिक रोटिया सेकने पे लगा है सब अपने आप को दलित हितैषी बताने की होड में है और सच ये है की किसी को रोहित की नहीं पड़ी एवम् तमाम ऐसे और विद्यार्थियो की नहीं पड़ी जो आने वाले समय में रोहित के नक़्शे कदम पर चलने को विवश होंगे ।


शर्म आनी चाहिए जिस प्रकार से तमाम राजनेतिक दल इस धरातल स्तर का उदाहरण देश के सामने प्रस्तुत कर रहे है । होना हो तो ऐसा की सब इस मुद्दे को एक सुदृढ़ मुद्दे की तरह देख कर संसद में कुछ ऐसा कानून पारित करते की कोई भी आगे से रोहित जैसा असहाय न हो । उन्हें एक ऐसी सामजिक संरचना का निर्माण करना चाहिए जिसमे इस प्रकार की कोई भी बात का जल्द से जल्द निवारण हो सके लेकिन न हमारे राजनेता इतने संवेदनशील है और न ही हमारी मीडिया।

बड़े दुःख के साथ ये कहना पड़ता है की आज मीडिया पर शक हो रहा है । आज जनधारणा ये बन गयी है की ये चैनल अथवा अखबार कांग्रेस वाला है ये चैनल या अख़बार भाजपा वाला ! कोई भी निस्पक्ष रूप से किसी भी खबर को नहीं दिखा रहा है और सबसे दुःख की बात ये है की वो चैनल्स भी उनपर लगे आरोपो को दिन प्रति दिन प्रमाड़ित करते जा रहे है।आज मीडिया का हर तबका किसी न किसी खास विचारधारा को प्रेरित है बल्कि उसे प्रोत्शाहित भी कर रहा है और उसके परिणाम स्वरुप एक दूसरे को निशाना बना कर आपसी संघठन में भी फूट पाड़ रहा है , निश्चित ही इस  समय भारत अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है।


पिछले दिनों JNU के छात्रसंघ के अध्य्क्ष कन्हैया  कुमार के साथ जो कुछ भी हुआ या JNU के घटनाक्रम पर जिस प्रकार से राजनीति हुई जो बिलकुल अशोभनीय है । एक कार्यक्रम जिसमे देशविरोधी नारे लगे वो गलत है चाहे वो किसी भी विचारधारा का समर्थन क्यों न करते हो ? लेकिन जिस प्रकार से इसे प्रोत्शाहित किया गया वो निश्चित ही निम्न स्तर  की राजनीति को बढ़ावा देता है क्युकी  इस  मुद्दे पर  भारतीय संसद के मुख्य विपक्षी दल के उपाध्यक्ष का जाना बिलकुल अनुचित है  और उससे भी ज्यादा दिल्ली के मुख्यमंत्री का वहां जाना । देशद्रोह का ये मामला न्यायलय के विचाराधीन है और पुलिस एवं प्रसाशन इसे अदालत की निगरानी में जांच कर रहे है तो फिर कसी को भी इस मुद्दे में दखल देने का कोई हक़ नहीं है। 



 इसलिए  अगर कुछ भी गलत या सही हो रहा है उसे न्याय दिलाने  काम अदालत करेगा आप उसमे अपनी राजनीती चमका रहे हो ये सरासर गलत है!!
आप विपक्ष में हो सरकार का विरोध करते हो तब आपका ये दायित्व है अगर कोई मुद्दा जो न्यायलय के अंतर्गत नहीं है तो आप उस मुद्दे को जनता के सामने ले जाओ सरकार को लताड़ो लेकिन वो भी मर्यादा में रह कर राष्ट्र प्रेम को बनाये रखते हुए। 
 यही हमारे संविधान की विशेषता है  और आशा करूँगा की ऐसा करते हुए मै  एकदिन आप सब को जरूर देखु।

अंशुमन श्रीवास्तव

Sunday, 29 November 2015

मीडिया पर सवाल क्यों नहीं??

                                   
                                       एक क़तरा जीत का जब पत्थर के होठो पे पड़ा
                                     उसके सीने में भी दिल धड़का मुर्दे में भी जान आ गई

बिहार चुनाव के नतीजे पूरी तरह से सामने आते आते श्री पुष्पेश पंत ने ये ट्वीट किया , जाहिर है जब पत्रकार देश का हाल शायराना अंदाज में बोलता है तो उसकी अभिव्यक्ति भी अभूतपूर्व हो जाती है लेकिन मेरी नजर उनके अगले पंक्ति पे थी जिसमे उन्होंने उपयुक्त लाइने कांग्रेस के संधर्व में कहीं ये सही है की रतलाम के लोकसभा उपचुनाव और बिहार के विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस में एक ऑक्सीजन का संचार हुआ है । लेकिन जल्द ही श्री राहुल गांधी की फ़ास्ट वोटिंग तकनीक से कांग्रेस को एक बार फिर बैकफुट पर धकेल दिया।

 पत्रकार और पत्रकारिता सामजिक समरसता के ऐसे पेशे है जिनमे व्यक्ति अपने विचारो से देश को  एवं समाज  को एक ऐसा चश्मा  देता है जिससे हम जैसे आम नागरिक देख सके। और अब जब पत्रकारिता अपनी  आत्मा ख़त्म करने  की दिशा में  बहुत आगे बढ़ चुकी हो तो ये पेशा  मात्र एक अन्य पेशे जैसा बन कर रह गया है जो वाकई कॉर्पोरेट वर्ल्ड जैसा हो। आज हम सब अपने अपने पार्टी लाइन के अनुरूप अपने अपने चैनल्स एवं समाचार पत्र को पहचान चुके है हमें वही देखना और पढ़ना पसंद है जिसे हम पसंद करते हो जो की मान्य है लेकिन हम तब बेचैन हो जाते है जब हमें कुछ ऐसा सुनने और देखने को मिल जाता है जिसे हम अलग हो या फिर हम जिसे जानबूझ कर अनजान बनने की कोशिश करते है ।  बात यही पे आ कर थम जाती है की आज सामजिक विभाजन  का एक कारण अगर हम मीडिया को माने तो इसमें कोई दो राय नहीं होगी। दादरी के कांड पर मीडिया भी उतनी ही दोषी है जितनी वो नपुंसक भीड़।

मीडिया की भूमिका ऐसे मोर्चो पे और जिम्मेदारी भरा होना चाहिए था लेकिन अफ़सोस है की TRP के बोझ तले दबी और कुछ चुनिंदा मालिको के आकांक्षाओ के आगे बेबस मीडिया सामाजिक समरसता को  तार तार करने में कोई कसर  नहीं छोड़ी है ।  मुझे आपत्ति है की दादरी की उन विषम परिस्थितियों में आप क्यों ऐसे लोगो के पास जाते हो जो सिर्फ आग़ उगलने का काम करते हो ,आज़म खान , गिरिराज सिंह , साक्षी महाराज जैसे चुनिंदा नेता है जो सिर्फ और सिर्फ ऐसे मौको की आढ़ में अपना मतलब साधने में लगे रहते है और आप और आपका चैनल या अख़बार  उन्हें एक ऐसा स्पेस देता है जिसमे वो जो मर्जी हो कह सकते हो वो भी बिना किसी रोकटोक के , क्या आपका समाज के प्रति कोई दायित्व नहीं है, क्या आप ऐसे लोगो की उपेक्षा नहीं कर सकते।

बिलकुल कर सकते है, अगर आप ठान ले तो ऐसे नेता एक कुएँ का मेढक बन के दम तोड़ देंगे और देश को ऐसे बयानों से मुक्ति मिलेगी लेकिन अगर ऐसा हो गया तो आप ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पे २४ घंटे का चैनल नहीं चला पाएंगे धन नहीं बना पाएंगे।  और फिर कॉर्पोरेट कल्चर का भी तो सवाल है।

अंधेरो को रोकने के लिए एक किरण काफी है और उस किरण की उम्मीद मुझे हमेशा रहेगी देखना होगा कब तक और किस हद तक हमें और शर्मिंदा होना बाकि है कभी न कभी तो ऐसा वक़्त जरूर आएगा जब हमारी  मीडिया जरूर सोचेगी -
                                               अपने होने का कुछ एहसास  न होने से हुआ
                                                 ख़ुद से मिलना एक शख़्स से खोने से हुआ
आशा है वो शख़्स को खोने से पहले एहसास हो बाकि आशावादी तो हमेशा रहूँगा ही मैं।

अंशुमान श्रीवास्तव

Saturday, 20 September 2014

कुछ तो बात जरूर होगी तुममे , यूँ ही कोई बावला नहीं होता.....

गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार
बेस्ट न्यूज़ एंकर




उत्कृष्ट सोच
देसी पत्रकारिता
विषय-वस्तु की अच्छी पकड़



ठेठ बिहारी अंदाज




यही है हमारे "नमस्कार मैं  रविश कुमार"


अंशुमान श्रीवास्तव

Saturday, 7 June 2014

"आते ही छा गयी मोदी सरकार"

     

                                                    "अंत भला तो सब भला"



अंततः गुजरात के मुख्यमंत्री की पदोन्नति हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में हो गयी।  जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए श्री मोदी ने साल भर से अधिक समय तक अथक परिश्रम किया उसे वो प्राप्त करने में सफ़ल हो गए। पुरानी गतिविधियों पे गौर तो भारत के बुद्धजीवी अपने अपने ढंग से करेंगे ही, मै आने वाले समय को लेकर ज्यादा आशांवित हूँ।  वैसे मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही परिवर्तन का आभाष होने लगा है कुछ समय पहले तक  सब ये पूछते थे की भाजपा  आने से भारतीय अर्थव्यस्था पर असर पड़ेगा क्या? ये एक ऐसा प्रश्न था जिसे लेकर हर कोई अपनी बात पिछले कुछ वर्षो से कहता था,और अगर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के अंको को सुधरती अर्थव्यस्था के चश्मे से देखेंगे तो कुछ हद तक पूर्व में पूछे गए प्रश्न का उत्तर हमें मिल सकता है,

बाजार में उछाल का माहौल है, मोटा मोटी ये मान सकते है की लोगो का बाजार पे विश्वास बढ़ा है जिससे वो अपना धन बाजार में लगा रहे है, इसके फायदे भी देखने को मिल रहे है मसलन हमारा रुपैया मजबूत हुआ है। 



इसी ब्लॉग पर रुपैये की बिगड़ी हालत पर मैंने लिखा था और आज करीब करीब 8 महीनो के बाद रुपैया अपनी शान में वापस लौट आया है आज सभी मुद्राओं में भारतीय मुद्रा सबसे अच्छा प्रदर्शन कर रही है और इसके पीछे की वजह राजनीतिक तख्ता पलट है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। पिछले 3 जून को प्रधानमंत्री ने 79 सचिवो के साथ बैठक की और जिस अंदाज़ में बैठक की गई उससे निश्चित ही निष्क्रिय पड़ चुके सरकारी तंत्र में कुछ हलचल पड़ी होगी,मोदी ने सभी सचिवो से निर्भीक हो कर काम करने की सलाह और इसी मंशा से उन सभी सचिवो को उनके संबंधित मंत्रियो के बिना बुलाया।  सभी सचिवो से पिछले कार्यकाल की उपलब्धि और नाकामी और आने वाले 5 सालो का खाका खीचने के लिए 10 स्लाइड्स के प्रेजेंटेशन की मांग की। 



सभी सचिवो को विभिन्न समूहों मेंसे G तक बाट दिया गया है और आगे से सभी मीटिंग्स मोदी इन्ही समूहों के अनुसार निर्धारित करेंगे। उदहारण के लिए वित्त विभाग के सभी सचिव GROUP-A में आएंगे इसी तरह से सारे मुख्य विभाग क्रमशः B से G तक में बांटा गया  है। मोदी ने आने वाले 100 दिनों के लिए विभिन्न विभागों को एक दिशानिर्देश देते हुए अपने अपने अजेंडे बनाने को कहा है। 



इसी तरह  चुनाव में जो MINIMUM GOVERNMENT MAXIMUM GOVERNANCE के मुद्दो को आगे बढ़ाते हुए मोदी के कैबिनेट सचिव अजित सेठ ने सभी सचिवो को 11 सूत्रीय निर्देश भेजा है जिसमे सरकारी कार्यालय के सम्बंधित कामकाज को सुदृढ़ करने पर जोर देने को कहा है। साथ ही उन्होंने वर्किग कल्चर और कार्यालय के वातावरण को और बेहतर करने के लिए कहा है। 

उनके 11 सूत्रीय निर्देश में प्रमुख है

  •  कार्यालयों की सफाई एवं कार्यालयों के गलियारों-सीढ़ियों   सफाई। इन जगहों पर कार्यालय संबंधित सामग्री या अलमारी नहीं दिखनी चाहिए। 
  • कार्यालयों के अंदर फाइलों और कागजो को व्यवस्थित करके रखा जाए, जिससे काम करने का सकारात्मक माहौल बने।
  • कार्यालयों के साज-सज्जा और उसकी सफाई के संदर्भ में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट 6 जून से हर रोज कैबिनेट सचिव के पास पहुंचनी चाहिए।
  • सभी विभागों से कहा गया है कि वे उन 10 नियमों को बताएं या खत्म करें, जो अनावश्यक हैं, जिनका कोई मतलब नहीं है और उनको हटाने से कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा।
  • सभी विभागों के सचिवों को फॉर्म को छोटा करने का निर्देश दिया गया है। हो सके तो संबंधित विभागों के फॉर्म एक पेज का किया जाए। 
  • किसी भी काम पर निर्णय लेने की प्रकिया चार चरण से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • काम को लटकाने की प्रवृत्ति खत्म की जाए। किसी भी फाइल या पेपर को तीन से चार सप्ताह के अंदर क्लियर किया जाए। 
  • नौकरशाह पावर प्वाईंट प्रजेंटेशन बनाएं, संक्षिप्त प्रभावी नोट तैयार करें। फाइलों को भारी भरकम बनाने से बचें। 
  • सभी सचिवों से 2009-14 के लिए तय किए गए लक्ष्य और उसकी वर्तमान स्थिति के बारे में विश्लेषण करने को कहा गया है। इसकी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को दी जाएगी।
  • सभी विभागों को एक टीम की तरह काम करने को कहा गया है। सभी स्तर पर नए विचारों का स्वागत किया जाए।
  • सचिवों से सहयोगपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया की आवश्यकता बताई गई है। जैसे अगर कोई विभाग किसी मसले को सुलझा नहीं पाता है तो वे कैबिनेट सचिव या प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क करें।                                        

 

मोदी चाहते हैं कि सभी विभाग उनकी कार्यशैली को अपनाएं ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज हो सके और विकासकार्य रफ्तार पकड़ सकें। निश्चित ही ऐसे उपायो वो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। और जरुरी है की हमारी थकाऊ और उबाऊ सरकारी वयस्था में कुछ नयापन आये तभी शायद कुछ अमूल-चूल परिवर्तन जिसे हम सब चाहते है संभव हो सके।वैसे मोदी ने अपने स्वभाव में परिवर्तन किये बिना युद्ध स्तर पर काम शुरू किया है वैसे कदमो का असर दिखने में कितना वक़्त लगता है पता नहीं परन्तु दिखे इसकी आशा तो हम कर ही सकते है। 



अंशुमान श्रीवास्तव।