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Saturday, 20 September 2014
Sunday, 13 April 2014
"गुलजार की गुलजारियत"
गुलजार को हिन्दी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिलने पर बहुत बहुत बधाई, उनके कुछ बेहतरीन गजल को मैने एक धागे मे पिरोने की कोशिश की हैं, इसका लुफ्त उठाए:-
अंशुमन श्रीवास्तव
मैंने तुम्हारे समंदर भी देखे हैं,
नीले रंग के
दूर-दूर तक फैले हुये,
कई लहरें आती हैं उमड़ती हुयी
और किनारों पर आकर लौट जाती हैं....
एक समंदर और है मेरे अंदर कहीं,
जो हर लम्हा हिलोरे मारता है,
उसका कोई किनारा नहीं,
उसकी सारी नमकीन लहरें
मैं भारी मन से पी जाया करता हूँ,
मुझे अपना समंदर चुनने की आज़ादी तो है न...
********
जाने क्यूँ आज कांप रहे हैं हाथ मेरे,
तुम्हारे सपनों के बाग
डरा से रहे हैं मुझे,
कैसे इन रंग-बिरंगे सपनों पर
मैं अपने गंदले रंग के खंडहर लिख दूँ...
********
गरीबी सिर्फ सड़कों पर नहीं सोती,
कुछ लोग दिल के भी गरीब होते हैं
अक्सर उनके बिना छत के मकानों में
आसमां से दर्द टपकता है..
..
********
हर दफ़े निखर निखर आता हूँ ग़मों से,
हर दफ़े एक नया ग़म पनप आता है...
डर है कहींदर्दका 'एडिक्ट' न हो जाऊं!
*****
तेरे जैसा लिखना-पढ़ना मुझे कभी न आया,
न दिन ढला, न रात उगी, न चाँद शरमाया,
निर- मूरख मैं तुझको पढ़- पढ़ बार-बार हर्षाया,
मुझे भी तरकीब बता 'गुलज़ार' हुनर कहाँ से लाया?
अंशुमन श्रीवास्तव
Labels:
#POETRY
Location:
Pune, Maharashtra, India
Sunday, 16 February 2014
" क्या सर्दी में सच में मोहब्बत हो जाती है"
क्या था वहाँ, जहाँ मै गया
क्यों खुदको और अपनों को अँधेरे में रखा
एक बात थी जो हर समय जुबान से निकल जाती है
क्या सर्दी में सच में मोहब्बत हो जाती है।
हर तरफ देख कर जब मैंने खुद को देखा
मै अकेला था किसको पता था
जिसे पता होना था वो तो व्यस्त था
मै वही हजरतगंज में अपने चाय में मस्त था।
बार बार पछताने का मन कर रहा था
और वहाँ से तुरत आने का मन कर रहा था
क्यों हो रही थी ऐसी उलझन पता नहीं
ऐ मेरे दिल ये तेरी खता नहीं।
अंशुमान श्रीवास्तवा
Labels:
#POETRY
Location:
Pune, Maharashtra, India
Monday, 14 October 2013
वो पगली लड़की..!!!
जब दर्द की काली रातों में गम आंसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
जब पोथे खाली होते है, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मना करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है...!
वो पगली लड़की जिसकी कुछ औकात नहीं, कुछ बात नहीं
जिसके दिल में शायद इतने भारी- भरकम जज़्बात नहीं
जो पगली लड़की मेरी खातिर नौ दिन भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत रखती है, मुझसे न कभी कुछ कहती है,
जो पगली लडकी कहती है, "मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ",
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ भी अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा-कहानी-किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
जब उस पगली लडकी के संग, हँसना फुलवारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है।
पर उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है...!
जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आंखों के नीचे छाइ दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो लल्ला दिन भर, कुछ सपनों का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते है,हम जाने मे घबराते हैं,
जब साड़ी पहने लड़की का, इक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब पूरे घर का समझाना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
पर उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है...!
जब दूर दराज इलाको से, खत लिख कर लोग बुलाते है
जब हम ट्रेनो से जाते है, जब लोग हमे ले जाते है
जब हमको ग़ज़लों गीतो का, वो राजकुमार बताते है
जब हम महफिल की शान बने, इक प्रीत का गीत सुनाते है
कुछ आँखे धीरज खोती है, कुछ आँखे चुप-चुप रोती है
कुछ आँखे हम पर टिकी-टिकी गागर सी खाली होती है
जब सपने आँजे हुए लड़कियाँ, पता माँगने आती है
जब नर्म हथेली से पर्चों पर आटोग्राफ कराती है
जब यह सारा उल्लास हमे खुद से मक्कारी लगता है
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है
पर उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है…. !!!
सौजन्य-श्री कुमार विश्वास
Labels:
#POETRY
Location:
Pune, Maharashtra, India
Sunday, 22 September 2013
फिर कभी मिला करो
यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो...
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो...
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो...
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो...
मुझे इश्तहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ,
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो...
कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ,
मेरे साथ तुम भी चला करो...
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो...
नहीं बे-हिजाब वो चाँद-सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो...
अंशुमन श्रीवास्तव
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो...
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो...
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो...
मुझे इश्तहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ,
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो...
कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ,
मेरे साथ तुम भी चला करो...
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो...
नहीं बे-हिजाब वो चाँद-सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो...
अंशुमन श्रीवास्तव
Thursday, 22 August 2013
मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला............
मैं कायस्थ कुलोदभव,
मेरे पुरखो ने इतना ढाला,
मेरे तन के लोहू में हैं ,
पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे हैं,
मदिरालय के आँगन में ,
मेरे दादा, परदादा के हाथ,
बिकी थी मधुशाला ।
मुसलमान और हिन्दू दो हैं,
एक मगर उनका प्याला,
एक मगर उनका मदिरालय,
एक मगर उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक,
मंदिर, मस्जिद में जाते ,
बैर बढ़ाते मंदिर, मस्जिद,
मेल कराती मधुशाला ।
आज हरिवंश राय बच्चन की कविता लिखने का मन हुआ तो लिख दिया। वैसे भी आज के राजनीतिक माहौल में उनकी यह कविता बहुत उचित है। बाकि कुछ कहना नहीं है कविता बहुत कुछ कह रही है…….
अंशुमन श्रीवास्तव
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