Sunday, 13 April 2014

"गुलजार की गुलजारियत"

गुलजार को हिन्दी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिलने पर बहुत बहुत बधाई, उनके कुछ बेहतरीन गजल को मैने एक धागे मे पिरोने की कोशिश की हैं, इसका लुफ्त उठाए:-

मैंने तुम्हारे समंदर भी देखे हैं, 
नीले रंग के दूर-दूर तक फैले हुये, 
कई लहरें आती हैं उमड़ती हुयी और किनारों पर आकर लौट जाती हैं.... 
एक समंदर और है मेरे अंदर कहीं, 
जो हर लम्हा हिलोरे मारता है, 
उसका कोई किनारा नहीं, 
उसकी सारी नमकीन लहरें मैं भारी मन से पी जाया करता हूँ, 
मुझे अपना समंदर चुनने की आज़ादी तो है न...
 ******** 
जाने क्यूँ आज कांप रहे हैं हाथ मेरे, 
तुम्हारे सपनों के बाग डरा से रहे हैं मुझे,
 कैसे इन रंग-बिरंगे सपनों पर मैं अपने गंदले रंग के खंडहर लिख दूँ...
 ******** 
गरीबी सिर्फ सड़कों पर नहीं सोती,
 कुछ लोग दिल के भी गरीब होते हैं 
अक्सर उनके बिना छत के मकानों में आसमां से दर्द टपकता है..
.. ******** 
हर दफ़े निखर निखर आता हूँ ग़मों से, 
हर दफ़े एक नया ग़म पनप आता है...
 डर है कहींदर्दका 'एडिक्ट' न हो जाऊं! 
*****
 तेरे जैसा लिखना-पढ़ना मुझे कभी न आया, 
न दिन ढला, न रात उगी, न चाँद शरमाया,
 निर- मूरख मैं तुझको पढ़- पढ़ बार-बार हर्षाया,
 मुझे भी तरकीब बता 'गुलज़ार' हुनर कहाँ से लाया?


 अंशुमन श्रीवास्तव

Saturday, 12 April 2014

" खुद को दोहराता कांग्रेसी इतिहास "

अब जब चुनावी घमासान पुरे जोरो पर है और आम चुनाव के चार चरण समाप्त हो चुके है तब जाकर कांग्रेस ने मोदी को घेरने  की रणनीति में बदलाव किया है "वाह भाई बड़ा जल्दी जाग गए "  लगता है कांग्रेस 2019 के चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर रही है क्युकी  जिस बॉडी लैंग्वेज में कांग्रेस के नेता दिख रहे है  उससे तो लगता है वो मान  कर चल रहे है की इस बार कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ होना तय है, हो भी क्यों न जिस राजनीतिक ज़मीन को कांग्रेस ने पिछले 10 वर्षों में खोया है उसको पाने में उन्हें किसी चमत्कार की जरुरत अवश्य है। ऐसा हर बार कांग्रेस के साथ होता रहा है इंदिरा गांधी के समय से जब भी कांग्रेस मजबूत बन कर सत्ता में आई उसे हर बार बड़ी निर्दयता से आम जनता ने अस्वीकार किया है चाहे वो आपातकाल के बाद की स्तिथि हो या राजीव गांधी की हत्या के बाद की स्तिथि जिसमे जनता दाल और खास कर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मजबूत जमीन  तैयार की भले ही वो कट्टरवाद को ही क्यों न बढ़ावा देता हो।

राजनीती में जब कभी भी उन्माद का जन्म हुआ तब किसी नयी पार्टी अथवा ठोस राजनीतिक मुद्दो का उदय हुआ और उसी तरह की उन्माद में में ही भारतीय जनता पार्टी और उसके मुद्दे उदय हुए है चाहे वो आपातकाल के बाद जनसंघ का जन्म हो या राजीव गांधी का अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का फैसला हो या फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह का मंडल आयोग लाने का फैसला हर बार और बार बार फ़ायदा भाजपा को मिला है, जहाँ ताला खुलवाने के फैसले से उन्हें राम मंदिर का मुद्दा मिला वही मंडल आयोग के आने से उन्हें कथित हिन्दू वोट बैंक के जातिगत आधार पर टूटने का डर बैठा जिसके वजह से 1991 का अयोध्या की घटना घटी जिसकी पृष्ट्भूमि थी की लोग पहले हिंदुत्वा के बारे में सोचे न की अपनी जाति के आधार पर।


ठीक उसी तरह आज भी यही हो रहा है 2009 के बहुमत के बाद आज कांग्रेस के पास चुनावी मुद्दो का अभाव है ओपिनियन पोल की माने तो कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास में इसबार सबसे कम  सीट जितने वाली है और ये बात अब कांग्रेस को भी पता है इसी के मद्देनजर वो इस बार आधे-अधूरे मन से चुनावी मैदान में है और इस बार भी फ़ायदा भाजपा को होने जा रहा है जो की हमेशा होता आया है लेकिन गौर करने वाली बात है की इस बार की लड़ाई कांग्रेस जातिगत आधार से ऊपर उठ कर सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता बनाने पर अड़ी हुई है क्युकी मोदी के नाम की घोषणा होने पर उन्हें लगता था की इस बार मुसलमान भी मोदी से भयभीत हो कर कांग्रेस को वोट देंगे और अपार ध्रुवीकरण होगा लेकिन इस बार के चुनाव में ध्रुवीकरण तो हो रहा है लेकिन दिलचस्प बात है दोनों तरफ से हो रहा है और यही पर कांग्रेस की सारी तथाकथित रणनीति धूल फाँकने लगी है।

कल ही कांग्रेस ने अपने वेबसाइट पर अटल बिहारी वाजपेयी की एक तस्वीर डाली है जिसमे श्री वाजपेयी चिंतित मुद्रा में दिख रहे है और उनके तस्वीर के निचे लिखा है :-

जरा सोचिये
"श्री मोदी ने राजधर्म का पालन नहीं किया।
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जिस व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के योग्य भी नहीं समझते थे, क्या आप देश का भविष्य उस व्यक्ति के हाथ में दे सकते है ? "

मगर कांग्रेस ये लिखना भूल गयी की अगर देश की बागडोर श्री मोदी को नहीं दे सकते तो किसे दे उन्होंने तो किसी का नाम भी नहीं लिखा, क्या फिर से श्री मनमोहन सिंह जैसे किसी को दे जिनके बारे में श्री संजय बारु जो की प्रधानमंत्री के मुख्य मीडिया सलाहकार रहे है ने कहा की देश की असली बागडोर परदे के पीछे से सोनिया जी चला रही थी बिना जबाबदारी के पद का उपयोग ये शायद विश्व में पहली बार हो रहा हो।

मुद्दो के अकाल से ग्रसित कांग्रेस इस चुनाव में जा चुकी है मगर anti-incombancy  और शसक्त नेतृत्व और दूरदर्शिता के आभाव में वो पराजय की ओर बहुत तेजी से भाग रही है ,शायद ये पहला चुनाव है जिसमे जाने से पहले सारी पार्टी को निर्णय का पहले से अंदेशा हैं और इस चुनाव में वो सिर्फ खानापूर्ति के लिए लड़ रही है।

देखने वाली बात ये है की आपातकाल के बाद जिस प्रकार इंदिरा गांधी का उदय हुआ,1991 के बाद के सालो में जिस प्रकार सोनिया गांधी का उदय हुआ उसी प्रकार 2014 के चुनाव के बाद कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए कौन से नए गांधी  का उदय होता है, वैसे राहुल भी अच्छा सिख रहे है देखते है दस सालो की  निष्क्रिय राजनीती करने का राहुल का दंड जनता कांग्रेस को आने वाले कितने सालो तक सत्ता से दूर रख कर देती है वही कांग्रेस का एक धड़ा प्रियंका गांधी के लिए काफी उत्साहित है और धीरे-धीरे कांग्रेस की तरफ से आने बयानों में ये और पुख्ता होगा, अब राहुल और प्रियंका किस तरह से 128 साल पुरानी सुस्त पड़ चुकी पार्टी में जान फुँकते  है और उन्हें ऐसा करने में कितना वक़्त लगता है वैसे ये बात तो आने वाली भाजपा सरकार (थाकथित ) अथार्थ मोदी सरकार पर भी निर्भर करेगा।

अंशुमान श्रीवास्तव 

Saturday, 29 March 2014

" सियासत में उलझे केजरीवाल "

इस मौसम कि मिसाल दूँ  या तुम्हारे मिजाज कि ,
कोई पूछ बैठा है बदलना किसे कहते है। 

आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली  के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बारे में ज्यादातर उच्च माध्यम वर्गीय श्रेणी के लोग यही छवि अपने मन में बना कर बैठे है, उन लोगो को समझ में नहीं आ रहा है कि जो केजरीवाल कांग्रेस के भ्रस्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन कि कोख़ से उपजी हुई पार्टी बनायीं और अपने वादो कि लम्बी फेहरिस्त बना कर चुनावी घमासान में कूदी वही पार्टी पर्याप्त बहुमत न होते हुए भी जब कांग्रेस ने समर्थन का राजनीतिक दाव खेला तो उसमे कैसे फँस गई।  पहली गलती को लोग उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता के तौर पर देख ही रहे थे कि अचानक अरविन्द ने 49 दिन कि सरकार छोड़ कर चले गए। 

भले ही उनका मकसद सही हो लेकिन राजनीती में टाइमिंग का बहुत बड़ा किरदार होता है जो केजरीवाल टाइमिंग के इतने बड़े खिलाडी थे अब टाइमिंग के कारन ही बैकफूट पर दिख रहे है, मै  निजी तौर पर अरविन्द और उनकी मंशा का बहुत बड़ा प्रसंसक रहा हूँ मगर कही न कही केजरीवाल ने जो किया उसका असर दिख रहा है, आज हम भले हम ओपिनियन पोल कि विश्वसनीयता पर हम संशय करे लेकिन कही न कही आप और अरविन्द अपनी जमीं खो रहे है। 

अरविन्द भले ही इस राजनीती कि बिसात के नए खिलाडी हो लेकिन है तो एक IITian  उन्हें पता है कि उच्च मध्यम  वर्गीय श्रेणी जो कि इस चुनाव में 35 से 40 प्रतिशत का वोट रखती है उनसे ख़फ़ा है और वो इसी ख़ाली  पड़े वोटो कि भरपाई अल्पसंख्यक वोटो से कर रहे है इसी के मद्देनजर उनका विरोध का पूरा फ़ोकस  अब नरेंद्र मोदी पर आ गया है उन्हें पता है कि मोदी कि छवि को लेकर अल्पसंख्यक समाज किसी गैर भाजपा दल कि तरफ भागेगी और जबकि सपा पर मुज्जफरनगर दंगो का आरोप है और कांग्रेस पर उनके साथ विश्वासघात का आरोप है तो इसमें अरविन्द और उनकी पार्टी मुस्लिम वोटरो के लिए एक पसंद बन सकती है और इसी कोशिश में अरविन्द केजरीवाल लगे हुए है। 

पार्टी कि इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए केजरीवाल खुद बनारस से चुनावी मैदान में उतरे है ,भले ही वो इस चुनाव में हार जाये परन्तु इससे वो मुस्लिम समाज में एक  नए मसीहा बन कर आने कि कोशिश कर रहे है इसमें वो कितना सफल हो पाते है ये तो वक़्त ही बतायेगा परन्तु आज केजरीवाल जिस कीचड़ को साफ़ करने इस चुनावी राजनीती में कूदे अब वो खुद इस कीचड़ में सने नजर आ रहे है और इसकी वज़ह मै केजरीवाल कि टीम को मानता हूँ। दिल्ली चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी के सभी बड़े नेता खुद को केजरीवाल कि तर्ज पर आगे बढ़ाते हुए लोकसभा में हाथ आजमाने उतर पड़े मगर जब उन्हें ये अहसास हुआ कि केजरीवाल के बिना उनकी राजनीतिक मंशा कभी पूरी नहीं हो सकती तो उन्होंने केजरीवाल को ये अहसास कराया कि अगर उनकी पार्टी विधानसभा में इतना अच्छा प्रदर्शन कर सकती है तो लोकसभा में क्यों नहीं ? इसी प्रश्न में उलझ कर केजरीवाल दिल्ली को उलझाकर कर बनारस और मोदी को साधने और अपनी पार्टी को सुलझाने निकल पड़े। 

इन सब पे तो मै  इतना ही कहूँगा 

तेरी ज़ुबान है झूठी  जम्हूरियत कि तरह ,
तू एक जलील सी गाली से बहतरीन नहीं। 
अरविन्द तो इस लेख को जब पढ़ेंगे तब पढ़ेंगे  हमारे जैसे चंद आम लोग बस लिख सकते है, और आप पढ़ कर सिर्फ मुस्कुरा सकते है। 

अंशुमान श्रीवास्तवा।

Saturday, 8 March 2014

" कीचड़ कमल और चाय"

पिछले एक साल से चुनावी गतिविधियो पर गौर करे तो पाएंगे कि इस राजनीतिक बयार में सिर्फ तीन चीजे उडी और वो थी कीचड़,कमल और चाय और जो सख्श इन सब से जुड़ा वो अब सबसे आगे खड़ा है भारत कि सबसे बड़ी कुर्सी पर विराजमान होने के लिए अब जबकि लोकसभा चुनाव के लिए ईवीएम पर पहला बटन दबने में सिर्फ एक महीना बचा है, एक बात साफ होती जा रही है कि इस चुनाव को अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रपति चुनाव जैसा बनाने की बीजेपी की रणनीति काफी हद तक कामयाब हो गई है। चाहे कांग्रेस जैसा राष्ट्रीय दल हो, या फिर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल या फिर आम आदमी पार्टी जैसे नए दल, सबके निशाने पर नरेंद्र मोदी हैं। बीजेपी और नरेंद्र मोदी के लिए इससे बेहतर हालात नहीं बन सकते थे।
यूपीए सरकार के कामकाज का 10 साल का लेखा-जोखा कहीं पीछे छूटता दिख रहा है। सूचना, खाद्य, शिक्षा के अधिकार या फिर भूमि अधिग्रहण को लेकर सरकार के ऐतिहासिक फैसले। सामाजिक सुरक्षा की कई योजनाओं पर उसकी कामयाबी। महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उसकी नाकामी, बिगड़े आर्थिक हालात, गिरती विकास दर, बढ़ती बेरोजगारी, फैसले न ले पाने से पंगु सरकार की बनी छवि, पड़ोसी देशों से खट्टे रिश्ते जैसे तमाम महत्वपूर्ण मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए लगते हैं।
ऐसा लग रहा है चुनाव यूपीए सरकार के 10 साल के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी के 12 साल के गुजरात में शासन के आधार पर हो रहा है। करीब डेढ़ साल पहले जब बीजेपी में नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी पर चर्चा शुरु हुई थी, तब पार्टी के रणनीतिकारों की सोच यही थी। उन्हें यह अंदाजा था कि नरेंद्र मोदी का नाम लेते ही विशेष किस्म का ध्रुवीकरण होने लगता है। चाहे पार्टी के विरोधी इसे सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण का नाम दें, लेकिन आम लोगों में उन्हें लेकर पसंद या नापसंद बिल्कुल साफ हो जाती है। जिन्हें फ्लोटिंग वोट कहा जाता है, वैसे मतों की संभावना मोदी के नाम पर समाप्त हो जाती है। लोग या तो उन्हें वोट देंगे या उनके खिलाफ देंगे।
रणनीतिकारों का यह भी आकलन रहा था कि कुछ क्षेत्रीय दल, जो अब तक गैरकांग्रेसवाद के नाम पर बीजेपी के साथ चले आते थे, कई नए कारणों से बीजेपी के साथ जुड़ने का रास्ता ढूंढेंगे। ऐसे क्षेत्रीय दल, जिन्हें मोदी की हिंदुत्व के पोस्टर बॉय की छवि के कारण अपने मुस्लिम वोटों के छिटकने का डर रहेगा, वे चुनाव के बाद बीजेपी के साथ आने में जरा भी नहीं हिचकिचाएंगे।
लोकसभा चुनाव को राष्ट्रपति चुनाव जैसा बनाने से यह फायदा होगा कि बीजेपी मोदी की लोकप्रियता का सीधे-सीधे फायदा उठा सकेगी। मोदी के नाम से दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में बीजेपी के मत प्रतिशतों में संभावित वृद्धि के मद्देनजर पार्टी को वहां नए सहयोगी बनाकर अपना जनाधार बढ़ाने में आसानी होगी। सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील यूपी और बिहार जैसे राज्यों में मोदी के चेहरे को आगे रख हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकेगा।
बीजेपी के रणनीतिकारों की यह योजना अभी कम से कम जनमत सर्वेक्षणों और विपक्षी दलों में मचे हड़कंप से तो कामयाब होती दिख रही है। जैसे अगर यूपी की बात करें, तो समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अपनी बड़ी रैली उसी दिन करते हैं, जिस दिन मोदी की बड़ी रैली होती है। जबकि मायावती को मोदी पर व्यक्तिगत हमले करने में भी परहेज नहीं रहा।
बिहार में रामविलास पासवान को साथ लेकर बीजेपी ने लालू और नीतीश दोनों के समीकरणों को बिगाड़ दिया है। लालू का हमला नीतीश के बजाए मोदी पर केंद्रित हो गया है, तो वहीं नीतीश को प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को सार्वजनिक करना पड़ा है, ताकि लोकसभा चुनाव के लिए बिहार के लोगों से वोट मांगने को सही ठहरा सकें।
दक्षिण भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बीजेपी की ताकत वाले इकलौते राज्य कर्नाटक में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर पार्टी से अलग हुए बीएस येदियुरप्पा और बी श्रीरामुलु साथ आ गए हैं। वहीं तमिलनाडु में मोदी के नाम पर बीजेपी के वोटों में बढ़ोतरी की संभावना के मद्देनजर डीएमडीके, एमडीएमके, पीएमके और बीजेपी का एक बड़ा गठबंधन बनने जा रहा है, जिसका लक्ष्य 30 फीसदी से अधिक वोट हासिल करना है।
आंध्र प्रदेश में पूर्व केंद्रीय मंत्री और एनटी रामाराव की बेटी पुरुंदेश्वरी बीजेपी में शामिल हो गई हैं। टीडीपी के साथ बीजेपी के तालमेल की संभावना बनी हुई है और टीआरएस ने कांग्रेस में विलय न करने का फैसला कर बीजेपी के साथ आने का रास्ता खुला रखा है।
ममता बनर्जी, जयललिता, एम करुणानिधि, नवीन पटनायक जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को छोड़ उत्तर भारत के सभी क्षेत्रीय नेता नरेंद्र मोदी के खिलाफ हमले करने में कांग्रेस के साथ हो गए हैं। राहुल गांधी खुद मोदी पर कुछ नहीं कहते हैं, लेकिन भिवंडी में एक सभा में जिस तरह से उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार बताया, उससे उनकी रणनीति का इशारा भी मिलता है। बीजेपी में मोदी विरोधी दलील देते थे कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से चुनाव में सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता मुद्दा बन जाएगा। राहुल के बयान से कुछ ऐसा ही इशारा मिला है।
इस बीच, आम आदमी पार्टी ने भी अपना पूरा ध्यान मोदी पर केंद्रित कर दिया है। अरविंद केजरीवाल इन दिनों गुजरात के दौरे पर हैं और उन्होंने मोदी से कड़वे सवाल पूछकर मोदी के विकास के दावों पर सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब उन्हें नहीं मिला।
कामयाबी हासिल करने के लिए मोदी की रणनीति यही रही है कि सारे विरोधी इकट्ठे होकर उन पर हमले करें। अब ऐसा ही हो रहा है। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि अब यह लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल नहीं, बल्कि ‘मोदी बनाम सब’ का हो गया है और इसमें नाकामी का मतलब है उनकी व्यक्तिगत हार।

आज हर राजनीतिक दल और हर राजनेता मोदी को ध्यान  में रख कर अपना भाषण लिखते है और मोदी इन सब से ऊपर उठ कर अपना लिखते है जिसकी वजह से सब मचल जाते है आज ही सलमान खुर्शीद एक  बार फिर मोदी पर निशाना साधते हुए कहा है कि वे विभिन्न प्रदेशों का पहवाना, पगड़ी और साफा तो पहनते है पर उन्हें एक छोटी सी टोपी से परहेज है।दिक्कत इन नेताओ कि नहीं है दिक्कत है मोदी कि जो अब ये साफ़ तौर पर समझ चुके है कि वो भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे है।  और जितना ये दल और उनकें  नेता उनपे कीचड़ फेंकेंगे उतना कि कमल और खिलेगा तो मोदीजी बधाई हो आपके 272+ के लिए आपसे बड़ा कोई नेता इस चुनाव में नहीं दिखता  सब आपके नमो चाय के आगे फीके है बस  इस चाय में शक्कर कि मात्रा का ध्यान रखियेगा वरना वो आपे घर के सबसे बड़े वाले बूढ़े वाले भीस्म पितामह आपको अपने ही चाय से बीमार न कर दे वैसे राजनीती है कुछ भी हो सकता है इसलिए मैं थोडा बहुत घबराता हूँ क्युकी वो बड़े वाले बहुत घाग है वैसे आपकी भी तैयारी कमाल कि है पहले उनकी महत्वाकांक्षी कुर्सी पर बैठने वालो में आप सबसे आगे निकल आये और अब उनकी सीट भी उनसे आपने हथिया लेंगे ऐसा लगता है वाह राजनीती हो तो ऐसी।


अंशुमान श्रीवास्तवा

" बुरा न मानो भाई होली आने वाली है"


















अंशुमान श्रीवास्तवा

Sunday, 16 February 2014

" क्या सर्दी में सच में मोहब्बत हो जाती है"

क्या था वहाँ, जहाँ मै  गया 
क्यों खुदको और अपनों को अँधेरे में रखा
 एक बात थी जो  हर समय जुबान से निकल जाती है
 क्या सर्दी में सच में मोहब्बत हो जाती है। 


हर तरफ देख कर जब मैंने खुद को देखा 
मै  अकेला था किसको पता था 
जिसे पता होना था वो तो व्यस्त था 
मै  वही हजरतगंज में अपने चाय  में मस्त था। 


बार बार पछताने का मन कर रहा था 
और वहाँ से तुरत आने का मन कर रहा था 
क्यों हो रही थी ऐसी उलझन पता नहीं 
ऐ मेरे दिल ये तेरी खता नहीं। 


अंशुमान श्रीवास्तवा

Saturday, 15 February 2014

"टाइमिंग वाले अरविन्द या अरविन्द वाली टाइमिंग"

'होगा वही जो "आप" रची रखा'

एक बार फिर सियासी हड़कम्प है अरविन्द भी राजनीती सिख गए है और इतनी निपूर्णता से सीखे है जिसकी वजह से भारत के दोनों प्रमुख सियासी दल के सियासत में उन्होंने भूचाल ला कर रख दिया है, एक IITian भले ही कुछ करे या न करे लेकिन अपना काम हमेशा से परफेक्ट टाइमिंग में  करता है   और इसके बहुत सारे उदाहरण है अन्ना  आंदोलन से लेकर कल के इस्तीफ़े तक उनकी हर चाल में असली राजनीती दिखती है, भले ही राहुल और मोदी को अपनी छवि बनाने के लिए बाहर के PR एजेंसियो का सहारा लेना पड़ा हो लेकिन अरविन्द अपने टाइमिंग से हमेशा विरोधियो पे भारी पड़े है।  

इस्तीफा शुक्रवार कि शाम को 9 बजे के आसपास होता है मतलब शुक्रवार कि रात से पूरा वीकेंड टीवी पर सिर्फ और सिर्फ आप और अरविन्द छाये रहेंगे, मतलब साफ़ है रविवार  को राहुल गांधी कि सबसे पहली सिर्फ महिला रैली प्रस्तावित है जितना कवरेज कांग्रेस और राहुल को इस रैली से उम्मीद होगी उन सभी उम्मीदों पर अरविन्द ने बट्टा लगा कर बता दिया कि असल राजनीती क्या है। 

वही दूसरी तरफ शनिवार को दिल्ली  में श्री अरुण जेटली, श्री समीर कोच्चर जो कि स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन है कि एक किताब का विमोचन करेंगे जिसका नाम ही MODINOMICS  है इस किताब में बताया गया है कि किस तरह से मोदी ने गुजरात को अपने MODINOMICS से बेहतर बनाया है, बीजेपी भी इसे कारगार  मीडिया कवरेज के रूप में देखती होगी लेकिन पूरी पटकथा अरविन्द के अनुसार चली और राजनीति के द्रोणाचार्य परास्त हुए  एकलव्य के हाथो। 

आगे कि राजनीती परिस्थिति क्या होगी इसका विशलेषण विद्वानों को करने दीजिये आप और हम बस अरविन्द कि टाइमिंग पर फोकस रहते है देखते है क्या होता है
चाय में भिंगो कर बिस्कुट खाने वाली आदत अरविन्द के लिए फायदेमंद साबित होती है या कहीं  गीली बिस्कुट मुह में जाने से पहले निचे गिर जाती है सब टाइमिंग का खेल है देखते है कहाँ तक खेल पाते है। वैसे आगे के लिए आशावादी तो मै  हु ही.……।

अंशुमान श्रीवास्तवा  

Saturday, 1 February 2014

"पिक्चर अभी बाकि है मेरे दोस्त"!!!

एक और वर्ष का आगमन हो गया और बहुप्रतीक्षित वर्ष में घटनाये किसी भी हिंदी फ़िल्म कि स्क्रिप्ट के अनुसार बदल रही है अभी क्लाइमेक्स का दौर है इस वजह से हर दल अपने आप और अपने दल का भविष्य सुनिश्चित करने में वयस्त है, कांग्रेस को छोड़ कर हर दल को लगता है कि आने वाले चुनाव में उसे  सत्ता कि कथित चाशनी  में डूबने का मौका मिल सकता है और इन सब  के लिए वो हर तरह से मन ही मन मनमोहन सिंह जी कि सरकार  का धन्यवाद दे रहे है।

बात अगर सिर्फ दलगत राजनीती तक सीमित रहती तो कोई बात थी परन्तु आज हर नेता, नौकरशाह ,पत्रकार , अभिनेता ,संगीतकार ,खिलाडी एवं समाज के हर छेत्र के लोगो के अंदर एक आवाज का संचार हुआ है (जैसा वो कहते है ) इसमें कुछ अनोखी बात नहीं है परन्तु ये सब चुनाव आते ही जागृत होता है ये जरुर अनोखी बात है। अचानक हर कोई देश सेवा करना चाहता है और उन्हें लगता है कि राजनीति के जरिये ही ये सम्भव है?? दिलचस्प बात है ये वही पॉलिटिक्स है जिसे लोग कभी घटिया कह कर नकार देते थे अब उन सबका मन परिवर्तित हो चुका है वजह चाहे अरविन्द हो ,मोदी हो ,या फिर कोई और लेकिन सब मुख्य-धारा  राजनीती में शामिल तो हो रहे है परन्तु कितने दूर तक पहुचेंगे ये देखने वाली बात होगी।

फेडरल फ्रंट का शगूफा एक बार फिर से छिड़ चूका है पुराने जनता दल वाले अब मिल कर मोदी को साधने  कि कोशिश करने जा रहे है और इस मुहीम में सबसे आगे बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार है, उनके अनुसार इस तथाकथित सेक्युलर फ्रंट में उनकी  जनतादल यूनाइटेड ,मुलायम सिंह कि सपा ,लेफ्ट पार्टी, नवीन बाबू कि बीजू जनता दल,देवगोडा कि जनता दल सेक्युलर और दक्षिण भारत कि अम्मा सहित १४ दलो  कि भारी -भरकम गठबंधन होने कि सम्भावना है।  इस मुद्दे पर जनता दल यूनाइटेड कि तरफ से उनके महासचिव त्यागी साहब और नेताजी कि तरफ से राम गोपाल यादव एवं लेफ्ट कि तरफ से सीताराम येचुरी इस मुद्दे पर अन्य दलो से बातचीत में व्यस्त है,  देखना होगा कि इस गठजोड़ का भविष्य कहा तक जाता है, मुलायम सिंह जी ने इसे  "राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चा " का नाम दिया है देखना होगा इस मोर्चे में एक दूसरे के धुर विरोधी दल साथ रहने के लिए कैसे सहमत होते है जैसे कि सपा और बसपा, जद -यू और राजद ,द्रमुक एवं अन्नाद्रमुख इत्यादि क्युकी इनका वजूद ही एक दूसरे के विरोध के ऊपर निर्भर करता है।

दूसरी तरफ ऐसा अनुमान है कि इस साल के आम चुनाव में छेत्रिय दलो को ४०% के आसपास का वोट मिल सकता है और अगर ऐसा होता है तो लगभग १३०-१४० सीटे इन दलो के पाले में आ सकती है लेकिन देखना होगा ये मोर्चा कब तक बनता है और अगर बनने में कामयाब हो जाता है तो कितना टिकता है क्युकी अगर परिस्थिति प्रधानमंत्री चुनने कि हुई तो आपस में मतभेद स्पष्ट दिखेगा और एक बार फिर अस्थिरथिरता कि तरफ हम बढ़ेंगे जो कि हम अब कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति के अनुरूप सहने में सक्षम नहीं है।

आज कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनकी खुद कि पार्टी बन कर खड़ी  हो गई है  एक १२५ से ज्यादा साल पुरानी पार्टी में काम करने के तरीको को बदलते बदलते एक दशक तो आराम से जायेगा और कांग्रेस इस समय उसी जख्म पर मरहम लगाने में व्यस्त है, राहुल गांधी भले देश जीत पाये या नहीं परन्तु ये तो तय है वो कांग्रेस से हार गए है और दूसरी तरफ मोदी बीजेपी जीत चुके है वरना  जिस इंटरव्यू को कांग्रेस और राहुल गांधी अपने लिए एक मजबूत हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकते थे उसी कि बदौलत आज वो बैकफूट पर जा चुके है अर्णव के इंटरव्यू को देखने के बाद कुछभी  ऐसा नहीं लगा जो राहुल देश को नया दे सकते है वैसे मै  आश्वस्त हु कि मोदी जरुर इंटरव्यू देंगे और जब देंगे तब उसकी भी ब्रांडिंग जोर शोर से होगी और बीजेपी सुनिश्चित करेगी कि ये इंटरव्यू हर घर तक पहुचे और बस यही पर कांग्रेस पीछे हो जाती है और इसी कि कमी उन्हें खामियाजे कि तरह २०१४ के आम चुनाव में देखने को मिलेगा।

इस चुनाव में दल अपनी हार जीत का अनुमान पहले ही लगा चुके है अब वो अपनी हार से नुकसान को कम करने और जीत से फायेदे को बढ़ाने में व्यस्त है और इसी कड़ी में बीजेपी का MISSION-272 एक कदम है, कांग्रेस भी राहुल को सीधे तौर पर प्रोजेक्ट करने से बचना चाहती है क्युकी उन्हें भी हार  का अनुमान जरुर है और अगर वो ऐसा करते है तो राहुल कि राजनीतिक छवि को बट्टा जरुर लगेगा जो किसी भी तरह से कांग्रेस के भविष्य के लिए नुकसानदेह है तो  तैयार रहिये क्लाइमेक्स में जाने के लिए क्युकी चुनावी साल है कुछ भी हो सकता है अभी तो पूरी कहानी बाकि है कौन हीरो साबित होगा और कौन विलेन ये भविष्य कि गर्व में छोड़ दीजिये और मेरी तरह आप भी आशावादी रहने कि कोशिश कीजिये  ।

अंशुमान श्रीवास्तवा।

Saturday, 7 December 2013

"आप" का अरविन्द

कल चुनाव के नतीजे आने वाले है तथाकथित सेमी-फाइनल  के पोस्ट पोल सर्वे में बीजेपी को उनके उम्मीद के मुताबिक सफलता जरुर मिली है, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को लेकर बीजेपी आश्वस्त जरुर है और हमेशा कि तरह राजस्थान कि जनता हर चुनाव में अपने इतिहास को दोहराती आयी है इसलिए वसुंधरा राजे सिंधिया भी इस बार मुख्यमंत्री बन जाएँगी ऐसा लगता है, मिजोरम का हाल बहुत बुरा है सारे  सर्वे में मीडिया मिजोरम को हमेशा चीन में ही पाती  है इसलिए अगर मीडिया के चश्मे  से देखे तो ऐसा लगता है कि चाहे कोई भी मिजोरम में अपनी सरकार बना ले देश कि राजनीती एवं राजनीतिक बिरादरी को पोषित करने वालो  को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।  सबसे दिलचस्प नतीजे दिल्ली के होंगे।

साल भर पहले दिल्ली में शीला जी अपनी सरकार  चलाने  में व्यस्त थी, बीजेपी कि तरफ से विजय गोयल साहब अपने आप को दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री मान  कर बैठे थे , उसी समय उसी दिल्ली के रामलीला मैदान में एक आदमी अपनी अलग पार्टी बनायीं जिससे उसका दवा था कि कि वो भ्रस्टाचार को मिटा देगा और सभी ने उसे बहुत हलके में ले लिया था, यहाँ तक कि देश कि मीडिया ने भी उसे और उसकी "आम आदमी पार्टी " को सिरे से ख़ारिज कर दिया था वहि अरविन्द केजरीवाल आज दिल्ली कि राजनीति में सबसे बड़ा भूचाल लाने  के लिया तैयार बैठा है।  कल के नतीजे चाहे कुछ भी हो अरविन्द हारे या अरविन्द जीते लेकिन कल से दिल्ली में अरविन्द नाम का हवा जरुर बहेगी, आगे से भले ही लोग हर नए राजनीति में आने वाले को लोग अरविन्द के नाम से चिढ़ाये लेकिन उसने अपने और अपने कुछ हजार साथियो के दम पर दिल्ली में बदलाव तो अभी से ही कर दिए है, मसलन आज सबको पता है शीला कि वापसी संकट में है  और विजय गोयल का कुछ अता-पता नहीं।

एक दौर गांधी का था, एक दौर जेपी का था ,एक दौर वाजपेई का था आज का दौर भले मोदी का हो सकता हो बावजूद इसके अरविन्द का है इसमें कोई शक नहीं है, अरविन्द कोई आम नेता नहीं है और न ही हो सकते है क्युकी चुनाव के दिन ये कहना "आप वोट किसी को भी दो मगर वोट जरुर दो " ऐसा कहना अपने आप में बहुत कुछ साबित करता है और इनको बाकियो से अलग करता है।

राजनीति में ये कहा जाता है कि पहला चुनाव हारने के लिए होता है दूसरा हरवाने के लिए और फिर तीसरा जीतने के लिए मगर अरविन्द और उनकी पार्टी अपने पहले चुनाव में दूसरे पायदान पे पहुँच  गयी है यही उनकी क़ाबलियत है और हो न हो यही उनकी जीत भी है , अन्ना आंदोलन के बाद नयी नयी पार्टी बनी थी जिसके नाम पे हसते हुए हमारे  दिग्गी दादा ने अंग्रेजी में mental  bankruptcy कहा था आज वही पार्टी उनकी पार्टी के परखच्चे उड़ा  रही है,  मैंने सुना था एक बार जब योगेन्द्र यादव  जो "आप" के नेता है उन्होंने कहा था कि उन्होंने और उनकी पार्टी ने कैसे नयी पार्टी में जान डाली हर मोहल्ले हर गली में जेन के बाद आज आलम ये है कि हर आदमी राजनीती में सफाई चाहता है और वो दिन दूर नहीं जब सफाई वो झाड़ू से चाहेगा आशा करता अरविन्द तक न सही आप सब तक जरुर मेरी ये बात पहुँचे  आगे मै  उन्हें और उनकी पार्टी को बधाई देता हूँ नतीजे चाहे जो भी आये मेरा आशावादी रुख कायम रहेगा।

अंशुमान श्रीवास्तव

Saturday, 23 November 2013

नामलीला या रामलीला

साहित्य और सिनेमा भारतीय संस्कृति कि वो धराये है जो गाहेबगाहे हम सब के सम्मुख हमारी ख़त्म हो  चुकि संस्कृति को हमारे सामने लाने का काम करती है, समाज के इन दोनों अंगो में अगर राजनीति घुस जाये  तब निश्चित ही हमारा आने वाला भविष्य संकट में है ,आज के सामाजिक परिवेश में निश्चित ही इन दोनों में राजनीति अपनी अमिट  छाप छोड़ रही है।

हाल में रिलीज़ हुई संजय लीला भंसाली कि एक प्रेम प्रसंगयुक्त फ़िल्म राम-लीला को देश के कुछ हिस्सो में रिलीज़ होने से रोक देना इसी बात का प्रमाण है, फ़िल्म को देखने के बाद कहीं भी ऐसा नहीं लगा जिससे किसी खास सम्प्रदाए और धर्म को हानि पहुँचती हो, वैसे न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और अशोक पाल सिंह की लखनऊ बेंच ने सुनवाई करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामलीला समिति, बहराइच द्वारा दायर एक याचिका पर इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित किया, वैसे याचिकाकर्ता ने 1 नवंबर को फिल्म के लिए दिया प्रमाण को सेंसर बोर्ड से रद्द करने के लिए प्रार्थना की थी और विवादास्पद और आपत्तिजनक संवादों को फिल्म से निकाल देने कि मांग की थी. साथ ही याचिका में उनके अनुसार फिल्म में धार्मिक हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुची है और इसका शीर्षक 'रामलीला' से भारतीय समाज पर बड़ा प्रभाव पड़ा है,राम 'लीला' (कार्य) के रूप में समाज के लिए एक गलत संदेश दे रहा है ऐसा तर्क याचिकाकर्ता का था। इसके अलावा उसने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, इरोज इंटरनेशनल और भंसाली को भी याचिका में एक पक्ष बनाया है। 

फ़िल्म जहाँ एकतरफ रामलीला  भंसाली कि बाकि फिल्मो कि तरह भव्य और विशाल है वही दूसरी तरफ रंगो से भरी हुई है "देवदास" और "हम दिल दे चुके सनम" कि तर्ज पर बनी फ़िल्म में दीपिका अपने अभिनय से फ़िल्म में जान फूक देती है, पूरी फ़िल्म में दीपिका अपनी आँखो के बेजोड़ अदाकारी से लीला को जीवित कर देती है,रणबीर सिंह ने फ़िल्म  में जान लगा दी है और वो अपने संवाद में गुजराती स्वाद महसूस कराते है, वही दूसरी तरफ फ़िल्म में संजय गुजरात कि संस्कृति का एक और पहलू हमारे सामने प्रस्तुत करते है, पूरी फ़िल्म में गोलियाँ बेपनाह चलती है और दो समुदायो के बीच कि दुश्मनी में राम और लीला के बिच का प्यार मात्र एक नजर में होना और बाकि कि सारी घटनाये बड़ी रफ़्तार से होती है मगर फ़िल्म के दूसरे हाफ में संजय इस रफ़्तार को बनाये रखने में असफ़ल साबित हुए है, फ़िल्म का अंत एकदम "इश्कजादे" कि तर्ज पर होता है परन्तु दर्शको में अफ़सोस नहीं छोड़ पाता जैसा "इश्कजादे" ने छोड़ा था कुल मिला कर फ़िल्म सिर्फ तीन वजहों से आप देख सकते है वो है बेहतरीन संगीत , भव्य सेट और दीपिका,रणवीर सिंह का  बेहद उम्दा अभिनय।   

फ़िल्म में किसी तरह से रामजी और उनकी रामलीला से कोई सम्बंध नहीं है और जो बेवकूफ इससे ऐसा समझते है उन्हें सबसे पहले तो इस फ़िल्म को देखना चाहिए,आज जो संस्कृति के तथाकथित भला सोचने वाले है उन्हें इन ओछी भावनाओं से सर्वप्रथम बाहर आना पड़ेगा और अगर उन्हें इतनी फ़िक्र है तो जो संस्कृति के नाम पर लूट-खसोट और धंधा चल रहा है उसे सबसे पहले बंद करना पड़ेगा, आज मंदिर-मस्जिद के नाम पर जो समाज का हश्र हो रहा है वो कभी किसी भी व्यक्ति के लिए अच्छा नहीं हो सकता और यहाँ उन संस्कृति के पुजारियों को आना पड़ेगा। 


भ्रष्टाचार प्रेमी,बलात्कार प्रेमी  और हर प्रकार का अत्याचार  प्रेमी एक किस्म कि इंडियन सोसाइटी कब तक नाम से डरेगी और नाम प्रेम में मरेगी।  गोलियो की रासलीला भी पिक्चर रामलीला में अदालती आदेश से ही जुड़ा  था। गुजरात में छत्रिय समाज़ को जाड़ेजा और राबाड़ी नाम पर तकलीफ हुई तब नाम बदल कर सानेडा और राजाड़ी कर दिया गया। वैसे शेक्सपीयर ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनका रोमियो-जुलिएट २१ वीं सदी में इतना रंगमय और उल्लासमय होगा कि दर्शक उसे हाथो हाथ स्वीकार करेंगे। अदालतें रोक लगाती रहे लेकिन पहले हफ्ते में रामलीला ने वह कमाई कर ली है,जिससे कोई अदालत नहीं रोक  सकती।   


अंशुमान श्रीवास्तव